Amit kumar chaurasia

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मिलखा सिंह (THE FLYING SIKH)


मिलखा सिंह का जन्म लायलपुर में 8 अक्तूबर 1935 को हुआ था। मैदानी प्रतियोगिताओं
के भारतीय संदर्भ में
मिल्खा सिंह का नाम
अत्यधिक प्रसिद्ध है।
उन्होंने सफलताओं को दूरी में
नापा। अपनी अदभुत गति के कारण वे 'उड़ता सिख' (FLYING
SIKH) के नाम से जाने गए।
मिल्खा सिंह देश के
सर्वश्रेष्ठ एथलीटों में एक
जाना पहचाना नाम है।
उनका गौरवपूर्ण खेल जीवन सदैव
युवा खिलाड़ियों को अधिक
से अधिक शानदार प्रदर्शन के
लिए प्रेरणा देता रहेगा।
आजकल वे नये
खिलाड़ियों को प्रशिक्षित करने में कार्यरत हैं। जीवन परिचय मिल्खा सिंह 1947 में अपने
परिवार के साथ नवगठित
पाकिस्तान से भारत आ गए थे। 9वीं पास करने के बाद वे
मेकैनिकल व्यवसाय में
संलग्न हो गए। 1953 में वे
सेना में भर्ती हो गये। सेना में
रहकर उन्होंने दौड़-कूद की और
विशेष ध्यान दिया और 400 मीटर की दौड़
की तैयारियाँ प्रारम्भ कर दीं। 1957 में उन्होंने 400 मीटर
की दौड़ को 47.5 सैकेंड में
पूरा करके नया राष्ट्रीय
कीर्तिमान बनाया था। 1958 में
टोकियो एशियाई खेलों में
भी उन्होंने 400 एवं 200 मीटर दौड़ में रिकार्ड बनाये। कार्डिफ़, वेल्स, संयुक्त
साम्राज्य में 1958 के
कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण
जेतने के बाद सिख होने
की वजह से लंबे बालों के साथ
पदक स्वीकार ने पर पूरा खेल विश्व उन्हें जानने लगा। 1960 के रोम ओलंपिक में
दुर्भाग्यवश वे पदक से वंचित
रहे और उन्हें चौथा स्थान
प्राप्त हुआ। मिल्खा सिंह ने
अपने देश के लिए सबसे
ज़्यादा सफलताएँ अर्जित की हैं मिलखा सिंह ने रोम के 1960 ग्रीष्म ओलंपिक और टोक्यो के 1964 ग्रीष्म ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। उनको "उड़न सिख"
का उपनाम दिया गया था। इसी समय पर उन्हें पाकिस्तान
से दौड़ने का आमन्त्रण मिला,
लेकिन बचपन की घटनाओं
की वजह से वे वहाँ जाने से
हिचक रहे थे। लेकिन न जाने
पर राजनीतिक उथल पुथल के डर से उन्हें जाने को कहा गया।
उन्होंने दौड़ने
का न्यौता स्वीकार लिया। दौड़ में मिलखा सिंह ने
सरलता से अपने
प्रतिद्वन्द्वियों को ध्वस्त
कर दिया, और आसानी से जीत
गए। अधिकांशतः मुस्लिम
दर्शक इतने प्रभावित हुए कि पूरी तरह बुर्कानशीन
औरतों ने भी इस महान धावक
को गुज़रते देखने के लिए
अपने नक़ाब उतार लिए थे,
तभी से उन्हें फ़्लाइंग सिख
की उपाधि मिली। मिलखा सिंह ने बाद में खेल
से सन्यास ले लिया और भारत सरकार के साथ खेलकूद के
प्रोत्साहन के लिए काम
करना शुरू किया। अब वे चंडीगढ़ में रहते हैं। उपलब्धियाँ इन्होंने 1958 के एशियाई खेलों में 200 मी व 400 मी में स्वर्ण पदक जीते। इन्होंने 1962 के एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता। इन्होंने 1958 के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीता। पुरस्कार एवं सम्मान मिल्खा सिंह 1959 में
'पद्मश्री ' से अलंकृत किये गये।
इन्होंने 80 की उम्र मेंएवरेस्ट को कर दिया बौना अगर दिल में जोश औरजज्बा हो तो फिर उम्र के किसी भी पड़ाव पर कुछ भी कर गुजरना मुमकिन है। जापान के यूचिरो मियूरा ने अस्सी साल की उम्र में एक नया विश्व रिकॉर्ड कायम किया है। वह दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचकर ऐसा करने वाले सबसे बुजुर्ग पर्वतारोही बन गए हैं। उन्होंने बृहस्पतिवार को यह उपलब्धि अपने नाम की। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय के एक अधिकारी तिलक पांडे ने बताया कि पेशेवर पर्वतारोही मियूरा ने सुबह नौ बजे 8,848 मीटर ऊंची पर्वत चोटी की चढ़ाई पूरी की। उनके साथ उनके बेटे गोटा मियूरा और आठ अन्य पर्वतारोही थे। मियूरा ने अपनेकरीबीप्रतिद्वंद्वीनेपालीपर्वतारोहीमिनबहादुर सेरचान का रिकॉर्ड तोड़ दिया। वह वर्ष 2008 में 77 साल की उम्र में ऐसा करने वाले सबसे बुजुर्ग पर्वतारोही बने थे। दिलचस्प बात यह है कि सेरचान ने भी मियूरा का पिछला रिकॉर्ड तोड़ा था। इनसे पहले मियूरा ही वर्ष 2003 में 70 की उम्र में माउंट एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचने वाले दुनिया के सबसे बुजुर्ग पर्वतारोही थे।

गामा पहलवान


गामा [जन्म का नाम ग़ुलाम
मुहम्मद] (जन्म-
1880 ईसवी अमृतसर, पंजाब - मृत्यु 21 मई
1960 लाहौर , पाकिस्तान ) शायद ही कोई
ऐसा भारतीय
खेल-प्रेमी हो,
जिसने 'रुस्तम-
ए-ज़मां' पहलवान
का नाम न सुना हो।
गामा पहलवान भारत में एक किंवदंती बन
चुके हैं।इसी प्रकार कुछ समय पहले तक
'गामा पहलवान' का नाम
लिया जाता था। 15 अक्टूबर 1910 में गामा को 'विश्व हॅवीवेट
चैम्पियनशिप' (दक्षिण
एशिया) में विजेता घोषित
किया गया। अपने पहलवानी के दौर
में
गामा की उपलब्धियाँ इतनी आश्चर्यजनक एवं अविश्वसनीय हैं
कि साधारणत: लोगों को विश्वास
नहीं होता कि गामा पहलवान
वास्तव में हुए थे। उपाधियाँ गामा को 'शेर-ए-पंजाब', 'रुस्तम-ए-
ज़मां' (विश्व केसरी) और 'द ग्रेट
गामा' जैसी उपाधियाँ दी गयीं।
गामा विश्व के एक मात्र पहलवान
थे जिन्होंने अपने जीवन में कोई
कुश्ती नहीं हारी। गामा ने भारत का नाम पूरे विश्व में ऊँचा किया।
1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद
जब पाकिस्तान
बना तो गामा पाकिस्तान चले गये।
पाकिस्तान के पूर्व
प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की शादी गामा पहलवान के भाई
की नातिनी कुलसुम बट से हुई है। प्रारम्भिक जीवन गामा का जन्म एक कुश्ती-प्रेमी मुस्लिम परिवार में 1880 में हुआ। अमृतसर पंजाब में पैदा हुए
गामा कश्मीरी 'बट' परिवार के
'पहलवान मुहम्मद अज़ीज़' के पुत्र
थे। उनका जन्म का नाम 'ग़ुलाम
मुहम्मद' था। उनकी रग-रग में
कुश्ती का खेल समाया हुआ था। गामा और उनके भाई 'इमामबख़्श' ने
शुरू-शुरू में कुश्ती के दांव-पेच पंजाब के
मशहूर 'पहलवान माधोसिंह' से
सीखने शुरू किए। दतिया के
महाराजा भवानीसिंह ने गामा और
उनके छोटे भाई इमामबख़्श को पहलवानी करने की सुविधायें
प्रदान की। दस वर्ष की उम्र में
ही गामा ने जोधपुर , राजस्थान में कई पहलवानों के बीच शारीरिक कसरत
के प्रदर्शन में भाग लिया और
'महाराजा जोधपुर' ने
गामा को उनकी अद्भुत शारीरिक
क्षमताओं को देखते हुए पुरस्कृत
किया। कुश्ती के दौर 19 साल के गामा ने तत्कालीन भारत
विजेता 'पहलवान रहीमबख़्श
सुल्तानीवाला' को चुनौती दे डाली। रहीमबख़्श गुजराँवाला पंजाब [1] का रहने वाला कश्मीरी, 'बट'
जाति का ही था। कहते है
रहीमबख़्श की लम्बाई 7 फीट थी।
गामा में शक्ति और
फुर्ती अद्वितीय थी लेकिन
गामा की लम्बाई 5 फुट 7 इंच थी। रहीमबख़्श अपनी प्रौढ़ा अवस्था में
पहुँच चुका था और
अपनी पहलवानी के अंतिम समय
की कुश्तियाँ लड़ रहा था।
रहीमबख़्श की उम्र का अधिक
होना गामा के पक्ष में जाता था। ऐतिहासिक कुश्ती भारत में हुई कुश्तियों में यह
कुश्ती 'ऐतिहासिक कुश्ती' के रूप
में जानी जाती है, जो घंटों तक
चली और अंत में बराबर छूटी।
अगली बार जब गामा और
रहीमबख़्श की कुश्ती हुई तो गामा ने रहीमबख़्श
को हरा दिया था, लेकिन
गामा की नाक से ख़ून बहने
लगा था और एक कान
भी जख़्मी हो गया था। रहीमबख़्श से अंतिम कुश्ती रहीमबख़्श (भारत केसरी)
को गामा ने अपने पहलवानी और
कुश्ती के दौर का सबसे बड़ा,
चुनौतीपूर्ण और
शक्तिशाली प्रतिद्वंदी माना। इंग्लैंड से लौटने के बाद गामा और रहीमबख़्श की कुश्ती इलाहाबाद में हुई। यह कुश्ती भी काफ़ी देर
चली और गामा ने इस
कुश्ती को जीतकर रुस्तम-ए-हिंद का ख़िताब जीता। इंग्लैंड की यात्रा रहीमबख़्श
सुल्लतानीवाला को छोड़ कर,
जिससे गामा की कुश्ती बराबर
छूटी थी, गामा ने भारत के
सभी पहलवानों को हरा दिया।
1910 के आस-पास गामा का नाम एकाएक दुनिया के सामने आया।
1910 की बात है, उस समय
गामा की उम्र लगभग तीस वर्ष
की थी। बंगाल के एक लखपति 'सेठ शरदकुमार मित्र' कुछ भारतीय
पहलवानों को इंग्लैड ले गए थे।
अपने भाई इमामबख़्श के साथ
गामा इंग्लैंड गये और वहाँ एक
खुली चुनौती इंग्लैंड के
पहलवानों को दे डाली। यह चुनौती इंग्लैंड के पहलवानों को एक
धोख़े जैसी लगी, जिसमें गामा ने
मात्र 30 मिनट में 3
पहलवानों को हराने की बात
कही थी, जिसमें कोई भी पहलवान
गामा से कुश्ती लड़ सकता था, चाहे वह किसी भी शारीरिक आकार
और वज़न का हो। विश्व दंगल का आयोजन उस समय लन्दन में 'विश्व दंगल' का आयोजन हो रहा था। इसमें
इमामबख़्श, अहमदबख़्श और गामा ने
भारत का प्रतिनिधित्व किया।
गामा का क़द साढ़े पाँच फ़ुट 7 इंच और
वज़न 200 पाउंड के लगभग था।
लन्दन के आयोजकों ने गामा का नाम उम्मीदवारों की सूची में नहीं रखा।
गामा के स्वाभिमान को बहुत ठेस
पहुँची। उन्होंने एक थिएटर
कम्पनी में जाकर दुनिया भर के
पहलवानों को चुनौती देते हुए
कहा कि जो पहलवान अखाड़े में मेरे सामने पाँच मिनट तक टिक
जाएगा, उसे 'पाँच पाउंड' नकद
दिया जाएगा। पहले कई छोटे-मोटे
पहलवान गामा से लड़ने को तैयार
हुए। गामा और रोलर की कुश्ती जब इस चुनौती को स्वीकार करके
कोई गामा से लड़ने
नहीं आया तो गामा ने 'स्टेनिस्लस
ज़िबेस्को' और 'फ़्रॅन्क गॉश'
को चुनौती दी। यह चुनौती अमेरिका के पहलवान 'बैंजामिन रोलर' ने स्वीकार की। गामा ने रोलर
को 1 मिनट 40 सेकेण्ड में पछाड़
दिया। गामा और रोलर
की दोबारा कुश्ती हुई, जिसमें रोलर
9 मिनट 10 सेकेण्ड ही टिक
सका। पहलवान रोलर की हार गामा ने पहले अमेरिकी पहलवान
रोलर को हराया और इमामबख्श ने
स्विट्ज़रलैंड के कोनोली और जान
लैम को मिनटों और सैकिंडों में
चित्त कर दिया। इस पर
विदेशी पहलवानों और दंगल के आयोजकों के कान खड़े हुए और
उन्होंने गामा को सीधे विश्व
विजेता स्टेनली जिबिस्को से
लड़ने को कह दिया। स्टेनिस्लस ज़िबेस्को से कुश्ती 10 सितम्बर 1910 को गामा और
'स्टेनिस्लस ज़िबेस्को'
की कुश्ती हुई। इस कुश्ती में मशहूर
'जॉन बुल बैल्ट' और 250 पॉउड
का इनाम रखा गया। 1 मिनट से
भी कम समय में गामा ने स्टेनिस्लस ज़िबेस्को को नीचे दबा लिया।
ज़िबेस्को आकार में और वज़न में
गामा से बड़ा था, इसलिए 2 घण्टे 35
मिनट की कोशिश के बावजूद
भी पेट के बल लेटा हुआ
ज़िबेस्को गामा से चित्त नहीं हो पाया। गामा ने पोलैण्ड के
इस पहलवान
को इतना थका दिया था कि वह
हांफने लगा। जब गामा ने
ज़िबिस्को को नीचे पटका तो वह
अपने बचाव के लिए लेट गया। उसका शरीर
इतना वज़नी था कि गामा उसे
उठा नहीं सके। कुश्ती का दूसरा दिन इस पर भी जब हार-जीत
का फैसला न
हो सका तो कुश्ती को अनिर्णीत
घोषित किया गया और फैसले के
लिए दूसरे दिन की तारीख़ तय
की गई। दूसरे दिन जिबिस्को डर के मारे मैदान में
ही नहीं आया। दंगल के आयोजक
जिबिस्को की खोजबीन करने
लगे, लेकिन वह न जाने कहाँ छिप
गया और इस प्रकार
गामा को विश्व-विजयी घोषित किया गया। विश्व विजेता उपाधि 17 सितम्बर 1910
को दोबारा दोनों के बीच
कुश्ती की घोषणा हुई, लेकिन
निश्चित तिथि और समय पर
ज़िबेस्को गामा का सामना करने
नहीं पहुँचा। गामा को विजेता घोषित कर
दिया गया और इनाम की राशि के
साथ ही 'जॉन बुल बैल्ट'
भी गामा को दे दी गई। इसके बाद
गामा की उपाधि 'रुस्तम-ए-
ज़मां' (ज़माना), 'विश्वकेसरी' अथवा 'विश्वविजेता' हो गयी। हराये गये पहलवान इस यात्रा के दौरान गामा ने अनेक
पहलवानों को धूल चटाई, जिनमें 'बैंजामिन रॉलर' या 'रोलर' [2], 'मॉरिस देरिज़' [3], 'जोहान लेम'[4] और 'जॅसी पीटरसन' [5] थे। रॉलर से कुश्ती में गामा ने उसे 15
मिनट में 13 बार फेंका। इसके बाद
गामा ने
खुली चुनौती दी कि जो भी किसी भी कुश्ती में
ख़ुद को 'विश्वविजेता'
कहता हो वो गामा से दो- दो हाथा आज़मा सकता है, जिसमें जापान का जूडो पहलवान 'तारो मियाकी', रूस का 'जॉर्ज हॅकेन्शमित', अमरीका का 'फ़ॅन्क गॉश' शामिल थे।
किसी की हिम्मत गामा के सामने
आने की नहीं हुई। इसके बाद गामा ने
कहा कि वो एक के बाद एक लगातार
बीस पहलवानों से लड़ेगा और इनाम
भी देगा लेकिन कोई सामने नहीं आया। स्टेनिस्लस ज़िबेस्को से अंतिम
कुश्ती 'रहीमबख़्श सुलतानीवाला' को हराने
के बाद गामा ने भारत के मशहूर 'पहलवान पन्डित बिद्दू'
को 1916 में हराया। इंग्लैंड के 'प्रिंस ऑफ़ वेल्स' ने 1922 में भारत
की यात्रा के दौरान गामा को चाँदी की बेशक़ीमती 'गदा' (ग़ुर्ज) प्रदान
की। इस बार गामा ने केवल ढाई
मिनट में
ही जिबिस्को को पछाड़ दिया।
गामा की विजय के बाद पटियाला के महाराजा ने गामा को आधा मन
भारी 'चाँदी की गुर्ज' और '20 हज़ार
रुपये' नकद इनाम दिया था। दक्षिण एशिया का महान
पहलवान 1927 तक गामा को किसी ने
चुनौती नहीं दी। 1928 में
गामा का मुक़ाबला पटियाला में एक
बार फिर ज़िबेस्को से हुआ 42
सेकेण्ड में गामा ने
ज़िबेस्को को धूल चटा दी और दक्षिण एशिया के महान पहलवान की उपाधि धारण की। 1929 के फरवरी के महीने में गामा ने 'जेसी पीटरसन' को डेढ़ मिनट में
पछाड़ दिया। इसके बाद 1952 में
अपने पहलवानी जीवन से अवकाश
लेने तक गामा को किसी ने
चुनौती नहीं दी। गामा अपने
पहलवानी जीवन में अजेय रहे जो किसी भी पहलवान के लिए
आज भी असम्भव है। यह गुण
गामा को विश्व का महानतम
पहलवान के दर्जे में ले आता है। जीवन का अंतिम दौर 1947 में भारत के बँटवारे के समय गामा पाकिस्तान चले गये वहाँ अपने भाई इमामबख़्श के साथ और अपने
भतीजों के साथ रहे और अपना शेष
जीवन बिताया। 'रुस्तम-ए-ज़मां' के
आखिरी दिन बड़े कष्ट और
मुसीबत में गुज़रे। रावी नदी के किनारे इस अजेय पुरुष को एक
छोटी-सी झोंपड़ी बनाकर
रहना पड़ा। अपनी अमूल्य
यादगारों सोने और चाँदी के तमग़े
बेच-बेचकर अपनी ज़िन्दगी के
आखिरी दिन गुज़ारने पड़े। वह हमेशा बीमार रहने लगे।
उनकी बीमारी की ख़बर पाकर
भारतवासियों का दु:खी होना स्वाभाविक
ही था। निधन महाराजा पटियाला और
बिड़ला बन्धुओं ने
उनकी सहायता के लिए
धनराशि भेजनी शुरू की, लेकिन
तब तक बहुत देर हो चुकी थी। 22 मई, 1960 लाहौर , पाकिस्तान को 'रुस्तम-ए-ज़मां' गामा मृत्यु से हार
गए। गामा मरकर भी अमर है।
भारतीय कुश्ती-कला की विजय
पताका को विश्व में फहराने का श्रेय
केवल गामा को ही प्राप्त है। नेशनल इस्टीटूयट ऑफ़ स्पोर्टस आज भी पटियाला में 'नेशनल
इस्टीटूयट ऑफ़ स्पोर्टस' में उनके
कसरत करने का उपकरण रखा हुआ है।
यह एक पत्थर का गोल चक्का है,
जिसको गले में पहन कर गामा बैठक
लगाया करते थे। इस गोल चक्के का वज़न 95 किलो है।

बुलंद हौसले के साथ स्कूटर सेदेखी दुनिया

कहते हैं इंसान में किसी चीज
को पाने या कर गुजरने का जुनून
हो तो कोई भी मुसीबत
उसका रास्ता नहीं रोक सकती है।
सेक्टर-26 में रहने वाले रिटायर्ड
मेजर जनरल राजेंद्र कुमार जैन ऐसे ही एक शख्स हैं। 79 वर्षीय राजेंद्र
का जज्बा और उनकी सोच 25 साल
के किसी युवा की तरह है।
यहीं वजह है कि उन्होंने अपने
जीवन का हर पल
पूरी जिंदादिली के साथ जिया है। अपने एडवेंचरस नेचर
की वजह से उन्होंने स्कूटर से
पूरी दुनिया देख डाली। मुख्य रूप से
मध्यप्रदेश के रहने वाले राजेंद्र
का कहना है कि बचपन से ही उन्हें
दुनिया देखने का शौक था। सर्विस के दौरान दुनिया को देखने
का मौका न मिल सका। इसलिए
रिटायरमेंट के बाद अपने ढंग से
दुनिया को देखने की ठान ली। कई राजदूतों से की मुलाकात : अपने सफर को पूरा करने के लिए राजेंद्र
कुमार को तमाम तरह
की सरकारी औपचारिकताएं
पूरी करने में वर्षों का समय लगा।
अलग-अलग देशों में स्कूटर से सफर
करने की अनुमति लेने में हर देश की एंबेसी से संपर्क किया। हर एक
एंबेसी के राजदूत से मुलाकात की।
वह कहते हैं
कि पूरी दुनिया का कल्चर अलग
है, वेशभूषा अलग है, रहन-सहन अलग
है। लेकिन प्यार की भाषा एक जैसी है, उसका अहसास एक जैसा है,
लोगों की मुस्कराहट एक जैसी है।
हवाई जहाज से जाते तो कुछ
सीमित शहर कुछ सीमित
लोगों तक पहुंच पाते, इसलिए
स्कूटर से जाने का आइडिया आया और इसे
पूरा करने की ठान ली।पहला सफर : उन्होंने पहला सफर दिल्ली से लंदन तक 1993 में
कि या। 14 अक्टूबर से 16 नवंबर
तक के 33 दिन के इस सफर में
उन्होंने 9 हजार किलोमीटर
की यात्रा की। इस यात्रा में करीब
21 किलोमीटर का सफर पानी के जहाज पर किया गया। वह अक्टूबर
1993 को दिल्ली से पाकिस्तान,
ईरान, टर्की, बुलगेरिया,
रोमानिया, हंगरी, ऑस्ट्रिया,
जर्मनी होते हुए लंदन पहुंचे। इस
बीच जर्मनी में उनका एक्सीडेंट भी हो गया था, लेकिन
लोगों की मदद से दो-तीन दिन
आराम करने के बाद वह
अपनी यात्रा पर रवाना हो गए। दूसरा सफर : उन्होंने अपना दूसरा सफर 2004 में किया।
दिल्ली से शुरू हुआ यह सफर
मियांमार, थाईलैंड, मलेशिया,
सिंगापुर होते हुए आस्ट्रेलिया तक
पहुंचा। दोनों तरफ से करीब 16
हजार किलोमीटर की यह यात्रा उन्होंने 34 दिनों में
पूरी की। इसके बाद 2007 में 75
साल की उम्र में वह साउथ इंडिया के
टूर पर भी निकले। दिल्ली से
नागपुर, हैदराबाद, चेन्नै, बंगलुरू, जॉग
फॉल, गोवा, बेलगांव, पुणे, मुंबई, अकोला होते हुए अमरावती तक गए।
आज 79 वर्ष के होने के बाद भी वह
कहते हैं जी चाहता है एक बार फिर
स्कूटर से दुनिया का नजारा देख लू,
लेकिन अब आंख, कान और
हड्डियों ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया है।
May 2013
M T W T F S S
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