सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयकः मौजूदा कानून कहीं से कमतर नहीं - See more at: http://www.chauthiduniya.com/2011/08/communal-riot-bill-the-l
Friday, December 6, 2013 7:43:03 AM
हम नई धाराओं और शक की रोशनी में स्थिति का अध्ययन और इस बात की कोशिश करेंगे कि जनता के सामने स्वदेशी, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों से लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से जिस विधेयक का निर्माण किया गया है, संसद में पेश होने के बाद उसका हश्र क्या होगा, इस सिलसिले में भाजपा नेता इस विधेयक पर अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं. अगर यह विधेयक पारित भी हो गया तो भारत के भाग्य पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, लेकिन अगर इसकी 138 धाराओं में से स़िर्फ सात धाराओं को ईमानदारी से लागू किया गया तो भारत स्वर्ग बन जाएगा, अन्यथा स़िर्फ यही कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार 2004 के चुनाव में किए गए अपने वायदे के मुताबिक़ और 2014 के आम चुनाव के मद्देनज़र यह विधेयक लाकर मुसलमानों को बहलाना चाहती है.
क्या इस बात पर विश्वास करना संभव है कि मौजूदा बिल के क़ानून बनने के बाद गुजरात और अयोध्या दोहराए नहीं जाएंगे. ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि क़ानून बनने के बावजूद उसे लागू करने की ज़िम्मेदारी उसी मानसिकता के लोगों को दिए जाने की बात कही गई है, जो वर्तमान व्यवस्था के मुखिया हैं. यह बात ज़रूर मानी जा सकती है कि नई-नई नीतियों और उनकी सराहना करके उन्हें नए शब्दों में ढालने की कोशिश की गई है, जैसे Assault, Sexual, Group Trageted Attack आदि. अलग-अलग गतिविधियों को नए शब्दों में बांधकर बिल को विस्तृत रूप दिया गया है और इसमें भारत के वर्तमान क़ानूनों के संशोधित रूप को शामिल किया गया है. साथ ही अनगिनत धाराओं को उनके अपने वास्तविक एक्ट से लेकर वर्तमान सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयक 2011 में शामिल कर दिया गया है. यही नहीं, दुनिया के दूसरे देशों, यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ आदि के क़ानूनों को भी इसमें शामिल किया गया है. इस तरह विधेयक प्रगतिशील, विस्तृत और नया लगता है, मगर असली जिन्न जो बोतल में बंद है, उसे खोलकर सज़ा देने के लिए कोई बेहतर उपाय इसमें न के बराबर हैं. इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि एक और धारा इस बिल में जोड़ी जाए कि देश एक ऐसा विभाग गठित करेगा, जो ईमानदार, मानवतावादी, ग़रीबों, पीड़ितों, मासूमों, महिलाओं एवं बच्चों के कल्याण के लिए सोचने वाले, क़ानून से डरने वाले, अपनी अंतर्रात्मा से डरने वाले प्रतिनिधि और अधिकारी पैदा करेगा. ऐसे काऱखाने का निर्माण संभव नहीं है. इसलिए कोई भी एक्ट या क़ानून कारगर नहीं है. फिर क्या क़ानून बनना ही नहीं चाहिए? ज़रूर बनना चाहिए, मगर क़ानून स़िर्फ दोहराए न जाते रहें, बल्कि जो क़ानून हैं उन्हें उसी भावना से लागू किया जाए, जिस भावना के साथ वे बनाए गए थे.
मौजूदा विधेयक की धाराओं से बिल्कुल सा़फ लगता है कि सरकार ने स़िफारिशों को व्यवहारिक रूप देने की कोशिश की है, लेकिन इस बात पर कम तवज्जो दी गई है कि आ़िखर धाराओं को लागू करने वाली ईमानदार मशीनरी कहां गढ़ी जाएगी? चलिए इस जवाब का इंतज़ार किया जाए. हो सकता है कि ईमानदार अधिकारियों और ईमानदार प्रतिनिधियों की पैदावार के लिए कोई बेहतर काऱखाना अस्तित्व में आ जाए और इस देश का भाग्य बदल जाए. इस मुद्दे पर वापस आया जाए कि यह विधेयक दूरदर्शिता पर आधारित है, क्योंकि इसे विभिन्न हादसों, घटनाओं, अनुभवों और ज़रूरत के अनुसार लाभकारी रूप में बनाया गया है. देश में सांप्रदायिक दंगे होते रहे हैं और इनकी आशंका लगातार बनी रहती है, इसलिए इनकी रोकथाम के लिए ऐसा क़ानून बनाया जाना चाहिए. यही कारण है कि केंद्र सरकार ने क़ानून बनाने का फैसला किया तो भारतीय संविधान के विभिन्न अधिनियमों और संयुक्त राष्ट्र संघ की अनेक धाराओं को लेकर इस नए विधेयक 2011 को अंतिम रूप दिया गया. इस विधेयक में कुछ धाराएं बहुत महत्वपूर्ण हैं. साथ ही बहुत से क़ानूनों एवं उनकी धाराओं की पूर्व की कमियों को दूर करके इसमें नयापन पैदा करने की कोशिश की गई है.
इस विधेयक का अधिकांश भाग पुराने भारतीय क़ानूनों और उनकी विभिन्न धाराओं पर ही आधारित है यानी दो तिहाई क़ानून जो इस विधेयक में पेश किए गए हैं, वे पहले से ही मौजूद हैं, मगर इसके बावजूद दंगे, अत्याचार, बलात्कार एवं हत्या जैसे अपराध नियंत्रित नहीं हो पा रहे हैं. इस समय तो यह स्थिति है कि अव्यवस्था, भ्रष्टाचार एवं लापरवाही को लेकर जब भी सरकार के खिला़फ आवाज़ बुलंद होती है तो पूरा देश एकजुट नज़र आता है. अन्ना हज़ारे और उनका अभियान क़ानून और न्याय के प्रति लोगों के रोष को ज़ाहिर करता है. ऐसी स्थिति में यह विधेयक क्या प्रभाव दिखाएगा, जगज़ाहिर है. अगर यह विधेयक ईमानदारी से लागू किया गया तो न जाने कितने अभियान जन्म लेंगे और दोषियों को सबक़ सिखाएंगे. इस विधेयक में शामिल दो तिहाई क़ानून का 10 प्रतिशत भाग भी ठीक से लागू कर दिया जाता है तो भारत की 60 प्रतिशत समस्याएं खुद-ब-खुद हल हो जाएंगी. अगर दो तिहाई क़ानून का ही स़िर्फ 90 प्रतिशत भाग लागू करने के लिए स़िर्फ पांच प्रतिशत ईमानदार अधिकारी मिल जाएं तो इस विधेयक की ज़रूरत ही नहीं पड़ती. क़ानून बनाने की ज़रूरत उस स्थिति में पड़ती है, जब अव्यवस्था फैलने लगती है और यह तब होता है, जब क़ानून को गूंगा और असक्षम समझ लिया जाता है, जैसा कि अब तक हमारे मौजूदा क़ानूनों के साथ होता चला आया है, जहां अपराधी आज़ाद घूमते हैं और निर्दोष जेल में ज़िंदगी गुज़ारने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं.
हम नई धाराओं और शक की रोशनी में स्थिति का अध्ययन और इस बात की कोशिश करेंगे कि जनता के सामने स्वदेशी, अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों से लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से जिस विधेयक का निर्माण किया गया है, संसद में पेश होने के बाद उसका हश्र क्या होगा, इस सिलसिले में भाजपा नेता इस विधेयक पर अपने विचार व्यक्त कर चुके हैं. अगर यह विधेयक पारित भी हो गया तो भारत के भाग्य पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा, लेकिन अगर इसकी 138 धाराओं में से स़िर्फ सात धाराओं को ईमानदारी से लागू किया गया तो भारत स्वर्ग बन जाएगा, अन्यथा स़िर्फ यही कहा जा सकता है कि केंद्र सरकार 2004 के चुनाव में किए गए अपने वायदे के मुताबिक़ और 2014 के आम चुनाव के मद्देनज़र यह विधेयक लाकर मुसलमानों को बहलाना चाहती है.
(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं)
क़ानून, जिनकी मदद से बिल का प्रारूप तैयार हुआ
1. इंडियन पैनल कोड
2. क्रिमिनल एक्ट
3. विटनेस एक्ट 1872
4. प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसिज बिल 2011
5. अन लॉ फुल एक्टिविटी (प्रीवेंशन) एक्ट 1967
6. नेशनल कमीशन फ्रॉर वूमेन एक्ट 1990
7. प्रीवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1988
8. द प्रीवेंशन ऑफ टॉर्चर बिल 2010
9. द विटनेस आइडेंटिटी प्रोटेक्शन बिल 2006
10. द एचआईवी, एआईडी एक्ट 1993
11. भारतीय दंड संहिता 1860
12. महाराष्ट्र कंट्रोल ऑ़फ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट (मकोका) 1999
13. प्रोटक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट 1993
14. सेंट्रल विजिलेंस कमीशन एक्ट
15. महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्पलाइमेंट गारंटी एक्ट 2005
16. द फीटल एक्सीडेंट एक्ट 1885
17. द इंडियन टेलीग्राफ एक्ट 1885
संयुक्त राष्ट्र संघ से संबंधित धाराएं
1. संयुक्त राष्ट्र कंवेंशन अगेंस्ट टॉर्चर एंड क्रिवेल ऑन ह्यूमन या डिग्रेडिंग ट्रीटमेंट या पनिशमेंट 1984
2. रोम स्टेच्यूएट ऑफ द इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट 1998
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