सांप्रदायिक दंगा निरोधक विधेयक: ईमानदारी से अमल की
Friday, December 6, 2013 7:49:40 AM
देश में नए क़ानून की नहीं, बल्कि सा़फ-सुथरे अमले की ज़रूरत है, जिसके दिल में खुदा का खौफ, समाज का डर, अपने खानदान के तबाह होने का खतरा और अत्याचार करने के कारण जनता की नज़र में गिर जाने की आशंका हो. अगर प्रशासनिक अधिकारी या प्रतिनिधि का ज़मीर जीवित है तो क़ानून बिल्कुल सही रूप में लागू होगा, वरना हर दिन नए क़ानून बनाने की ज़रूरत प़डती रहेगी. देश में अत्याचार, दंगे, आगज़नी, बलात्कार और आतंकी गतिविधियां पांव पसारती रहेंगी, क्योंकि इन्हें उसी घर से हमेशा संरक्षण मिलता रहा है, जिसे जनता इंसा़फ का मंदिर समझती है.
दूसरी तऱफ केंद्र सरकार इस बिल को सांप्रदायिक सद्भाव के लिए एक महत्वपूर्ण क़दम मानती है. उसका कहना है कि हर हाल में यह बिल क़ानून का रूप धारण करेगा और इसे लागू करके ही दम लिया जाएगा. उसका कहना है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस बात के लिए बाध्य होंगी कि वे ऐसे उपाय करें, जिससे सांप्रदायिक सद्भाव के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों, दंगा करने वालों, जान-माल को नुक़सान पहुंचाने वालों को क़डी से क़डी सज़ा दी जा सके. दोनों सरकारों और उनकी सहयोगी संस्थाओं को यह अधिकार होगा कि वे एफआईआर दर्ज करें, स्वतंत्र रूप से पारदर्शिता से जांच करें, सबूत एकत्र करें, सरकारी अमले एवं पुलिस प्रशासन की मनमानी पर लगाम लगाएं और उनको सज़ा दें. दोनों सरकारों को इस बात का भी अधिकार होगा कि जहां दंगा हो गया है या होने की आशंका है, वहां स्थिति पर नियंत्रण न कर पाने की हालत में और मदद करने, साज़िश करने, हवा देने, संरक्षण देने, ढील देने के ज़िम्मेदार अधिकारियों को स्थानांतरित कर स्थिति को क़ाबू में करने के लिए वे अच्छे अधिकारियों को तैनात कर सकें. यह बिल स्पष्ट करता है कि सरकार ने इस बात की कोशिश की है कि इसमें ऐसी धाराएं शामिल की जाएं, जिनकी मदद से सांप्रदायिक दंगों को रोका जा सकेगा. यह बिल केंद्र को इस बात का भी अधिकार देता है कि वह राज्य के किसी भी क्षेत्र को सांप्रदायिक दंगा प्रभावित क्षेत्र घोषित कर दे (लेकिन फिलहाल ऐसा करना उचित नहीं होगा) और संबंधित राज्य की अनुमति के बिना उस क्षेत्र में सुरक्षाबल तैनात कर दे. इस बिल की एक महत्वपूर्ण बात यह भी बताई जाती है कि संबंधित राज्य में हुए दंगों की जांच की सुनवाई दूसरे राज्यों में की जाएगी, ताकि कार्रवाई निष्पक्ष रूप से हो सके.
दूसरी तऱफ भाजपा का कहना है कि यह बिल भारत की मूल भावना को ठेस पहुंचाता है. अगर इस बिल को लागू किया जाता है तो राज्यों में भी केंद्र का हस्तक्षेप ब़ढ जाएगा और व्यवस्था प्रभावित होगी. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह तो ऐसा क़ानून है, जो खुद अपराधियों को शरण देता है और इससे राज्यों में दहशतगर्दी में ब़ढोत्तरी होगी. इस बिल में डॉक्ट्रन ऑफ कमांडेंड सुपिरियर रिस्पोंसिबिलिटी के नज़रिये को बिल्कुल ताख पर रख दिया गया है यानी इस नियम के तहत जो जितना ब़डा अधिकारी है, उसकी पहली ज़िम्मेदारी होती है कि उसके अधीनस्थ क़ानून के हिसाब से कार्यवाही करें. अधीनस्थों की कमियों, उनके द्वारा ग़ैरक़ानूनी कार्य अंजाम देने पर उसका परिणाम सबसे पहले उच्च अधिकारी को झेलना पड़ता है. उदाहरण के रूप में इस नियम के तहत पूर्व सांसद अहसान जा़फरी की पत्नी ने गुलबर्ग सोसायटी के क़त्लेआम और आगज़नी की सूचना अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर को दी थी, लेकिन उन्होंने अपने अधीनस्थ के ग़ैरक़ानूनी कारनामों पर कोई कार्रवाई नहीं की और हत्या व लूट को होने दिया. इसलिए इस नियम के तहत सबसे पहले उच्चाधिकारी को हत्या व लूट के लिए फांसी की सज़ा मिलनी चाहिए थी. परिस्थितियों की मांग है कि इस नियम को डॉक्ट्रन बिल 2009 के प्रारूप में शामिल किया जाता, लेकिन मौजूदा बिल में उच्चाधिकारियों और ब़डे नेताओं को सज़ा देने की बात शामिल नहीं है. इसी तरह पुलिसकर्मियों द्वारा महिलाओं का यौन उत्पी़डन किए जाने के मामले में भी इस बिल में कुछ नहीं है, जबकि यह ज़रूरी है कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अत्याचार को भी सांप्रदायिक दंगों के दायरे में लाया जाए.
तमाम समर्थन और विरोध के बीच 2005 के बिल को संशोधित कर सरकार ने उसे क़ानून बनाने की इच्छा जता दी. केंद्र सरकार ने इसमें कई ऐसी धाराओं को शामिल कर दिया है, जो मुस्लिम प्रतिनिधियों की स़िफारिशों पर आधारित हैं. इस बिल को अब संसद में प्रस्तुत करने की तैयारी है. ऐसा लगता है कि भाजपा किसी भी हालत में मौजूदा बिल को बहुमत के साथ पारित नहीं होने देगी, जबकि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस बिल को संशोधन के साथ पेश और पारित करके क़ानूनी रूप देना चाहते हैं. केंद्र सरकार ने 2004 के घोषणापत्र में किए गए वायदे के मुताबिक़ अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों को आर्थिक एवं शारीरिक नुक़सान और उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने की घटनाओं पर रोक लगाने तथा अपराधियों को सज़ा देने के लिए 2005 में एक बिल का प्रारूप तैयार कर लिया था और जनता के सामने पेश भी कर दिया था, लेकिन मुस्लिम प्रतिनिधियों ने इस कोशिश को असंतोषजनक क़रार देकर इसे खारिज कर दिया और अपनी तऱफ से सरकार के सामने कुछ स़िफारिशें रखीं और मांग की कि इन्हें शामिल कर लेने से यह बिल अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है और देश को खोखला करने वाले सांप्रदायिक दंगों पर लगाम लगाई जा सकती है. अल्पसंख्यक वर्ग की तऱफ से पेश स़िफारिशों को सामने रखते हुए केंद्र सरकार ने एक नए बिल का प्रारूप तैयार कर लिया और इसे Prevention of Communal and Trageted Violence (Access to Justice and Reparations) Bill 2011 नाम दिया गया. केंद्र सरकार की नीयत पर शक करना इस समय उचित नहीं है, लेकिन जो स्थिति तमाम पूर्व नियोजित दंगों में देखने को मिलती रही है, उसके मद्देनज़र इस बिल से भी विशेष परिणाम की उम्मीद करना स़िर्फ खुद को धोखा देने जैसा है.
इसका सबसे ब़डा कारण यह है कि दंगों को रोकना, अच्छे-बुरे, छोटे या लंबे क़ानूनों और उनके बिंदुओं पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उनके ठीक से लागू होने पर निर्भर है और किसी भी क़ानून को लागू करना उसे लागू करने वालों की नीयत पर निर्भर करता है. सरकार, प्रशासन, दल, संगठन की बुनियाद पर दंगों को रोका या फैलाया जाता रहा है. स़िर्फ यह उम्मीद कर लेना कि नया क़ानून लागू हो गया है, इसलिए दंगे रुक जाएंगे, एक ब़डी ग़लत़फहमी होगी, क्योंकि अब तक देश में जितने भी क़ानून हैं, वे दंगों और तमाम अपराधों को रोकने के लिए का़फी हैं. भारतीय संविधान की धाराएं ही सभी अपराधों की पहचान और उन्हें समाप्त करने के लिए का़फी हैं, मगर लोगों का कहना है कि साइंस और तकनीक के इस दौर में नए दिमाग़ के षड्यंत्रकर्ता नए तौर तरीक़ों के ज़रिये अपराध करते हैं और क़ानून पुराने हैं. इसलिए पुराने क़ानून से अपराधों पर नियंत्रण पाना संभव नहीं है. मैं इस नज़रिये से इत्ते़फाक़ इसलिए नहीं करता, क्योंकि अपराध को रोकने, दंगों को खत्म करने में कामयाबी इसलिए नहीं मिलती है, क्योंकि मौजूदा क़ानून अपनी मूलभावना के अनुरूप लागू नहीं किया जाता. देश में नए क़ानून की नहीं, बल्कि सा़फ-सुथरे अमले की ज़रूरत है, जिसके दिल में खुदा का खौफ, समाज का डर, अपने खानदान के तबाह होने का खतरा और अत्याचार करने के कारण जनता की नज़र में गिर जाने की आशंका हो. अगर प्रशासनिक अधिकारी या प्रतिनिधि का ज़मीर जीवित है तो क़ानून बिल्कुल सही रूप में लागू होगा, वरना हर दिन नए क़ानून बनाने की ज़रूरत प़डती रहेगी. देश में अत्याचार, दंगे, आगज़नी, बलात्कार और आतंकी गतिविधियां पांव पसारती रहेंगी, क्योंकि इन्हें उसी घर से हमेशा संरक्षण मिलता रहा है, जिसे जनता इंसा़फ का मंदिर समझती है. कांग्रेस या कोई अन्य पार्टी अपने फायदे यानी चुनाव जीतने के लिए जितने भी क़ानून बना ले, लेकिन उन्हें लागू सरकारी अमला यानी आईएएस, आईपीएस, जज और अन्य प्रशासनिक अधिकारी ही करेंगे. सत्ताधारी इन्हीं प्रशासनिक अधिकारियों को क़ानून लागू करने या उसका उल्लंघन करने के लिए शह देते हैं. वे इन्हें ईनाम देते हैं या सज़ा देते हैं. परिणाम यह होता है कि ईमानदार अधिकारियों को सज़ा भोगनी प़डती है और साज़िश करने वालों को नवाज़ा जाता है. कानून को किस तरह लागू किया जाए, इस पर ही सारा दारोमदार होता है.
जारी…
(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं)
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