Saturday, February 15, 2014 8:09:19 AM
जब से प्रज्ञा सिंह ठाकुर एवं दयानंद पांडे आदि द्वारा आतंकी हमलों की साजिश रचने और उन्हें अंजाम देने की ख़बरें सामने आई हैं, तबसे हिंदू आतंकवाद शब्द आम प्रचलन में आ गया है. विभिन्न एजेंसियों द्वारा की गई जांच से यह पता लगा है कि हिंदू राष्ट्र एवं हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित उक्त संगठन मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर, गोवा एवं समझौता एक्सप्रेस धमाकों के पीछे हो सकते हैं. इन संगठनों में बजरंग दल, अभिनव भारत एवं सनातन संस्था आदि शामिल हैं. इसके विपरीत हिंदुत्व की राजनीति के झंडाबरदारों का कहना है कि हिंदू धर्म को आतंकवाद से जोड़ना पूर्णत: अनुचित है, क्योंकि आतंकवाद पर केवल उन धर्मों का एकाधिकार है, जिनके पैगंबर हुए हैं अर्थात इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्म. कुछ टिप्पणीकार कहते हैं कि इन तीनों धर्मों के अनुयायियों का धार्मिक आतंकवाद का लंबा इतिहास रहा है, जबकि हिंदुओं ने कभी आतंक का सहारा नहीं लिया. ईसाई, यहूदी एवं इस्लाम धर्म में तीन समानताएं हैं. पहली यह कि उनके अनुयायी स्वयं को इब्राहिम की संतान मानते हैं. दूसरी, तीनों धर्म एकेश्वरवादी हैं और तीसरी यह कि उनकी एक ही धार्मिक पुस्तक है.
हिंदू धर्म के सिद्धांतों के इसी लचीलेपन एवं उदारता का फायदा उठाकर कुछ तत्व अपने बेहूदा विचारों को भी इसका हिस्सा घोषित कर देते हैं. धर्म एक जटिल संस्था है. इसमें धार्मिक संस्थान, पवित्र पुस्तकें, रीति-रिवाज, रूढ़ियां एवं परंपराएं शामिल हैं. इन सबका हमेशा एक-दूसरे से मेल खाना न तो संभव है और न आवश्यक.
इब्राहिम को अपना पूर्वज मानने वाले तीनों धर्मों की मान्यता है कि ईश्वर ने पैगंबरों के ज़रिए अपना संदेश भेजा. इसके विपरीत हिंदू धर्म का कोई पैगंबर नहीं है और वह शनै: शनै: विकसित हुआ है. समय के साथ नई परंपराएं एवं पंथ उसके हिस्से बनते गए. इन परंपराओं में वैदिक, उत्तर वैदिक, मध्यकालीन एवं आधुनिक परंपराएं शामिल हैं. कोई हिंदू नास्तिक भी हो सकता है, एकेश्वरवादी भी और कई भगवानों में आस्था रखने वाला भी. हिंदू धर्म के सिद्धांतों के इसी लचीलेपन एवं उदारता का फायदा उठाकर कुछ तत्व अपने बेहूदा विचारों को भी इसका हिस्सा घोषित कर देते हैं. धर्म एक जटिल संस्था है. इसमें धार्मिक संस्थान, पवित्र पुस्तकें, रीति-रिवाज, रूढ़ियां एवं परंपराएं शामिल हैं. इन सबका हमेशा एक-दूसरे से मेल खाना न तो संभव है और न आवश्यक. धार्मिक शिक्षाओं की व्याख्या तत्कालीन सामाजिक संदर्भों में की जानी चाहिए. हर धर्म शांति एवं सद्भाव को महत्व देता है, परंतु साथ ही हर धर्म में हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराने वाले तत्व भी हैं. बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि किसी धार्मिक सिद्धांत की व्याख्या कौन और किस उद्देश्य से कर रहा है. एक ही उदाहरण की कई व्याख्याएं की जा सकती हैं. इब्राहिम को अपना पूर्वज मानने वाले धर्मों में हिंसा की यत्र-तत्र चर्चा मात्र से उक्त धर्म हिंसा एवं आतंक के प्रणेता नहीं बन जाते. हिंसा और आतंक की जन्मदाता सामाजिक परिस्थितियां होती हैं, धार्मिक सिद्धांत नहीं. कई बार शासक एवं राजा अपने साम्राज्य का विस्तार करने की अपनी महत्वाकांक्षा को क्रूसेड, जिहाद या धर्मयुद्ध का नाम देकर उस पर धर्म का मुलम्मा चढ़ा देते हैं. हिंदू धर्म एक ओर तो वसुधैव कुटुंबकम की बात करता है तो दूसरी ओर जाति प्रथा के रूप में हिंसा उसके मूल ढांचे का हिस्सा है. वेदों से लेकर मनु स्मृति तक में वर्ण व्यवस्था एवं जाति प्रथा का उल्लेख है और कुछ साधु-संत आज भी जाति प्रथा को औचित्यपूर्ण ठहराते हैं. महाभारत में भगवान कृष्ण स्वयं अर्जुन से अपना धार्मिक कर्तव्य पूरा करने के लिए हथियार उठाने का आह्वान करते हैं. रामायण में हिंदू धर्म के रक्षार्थ भगवान राम शंबूक का वध करते हैं. हिंदू धर्म की रक्षा के लिए पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों का नरसंहार किया था. आज भी धार्मिक एवं जातिगत परंपराओं के नाम पर खाप पंचायतें युवा जोड़ों का क़त्ल कर रही हैं. मंगलोर के पब में लड़कियों की इसलिए पिटाई की गई, क्योंकि वे हिंदू परंपराओं के विरुद्ध आचरण कर रही थीं. अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा इस आधार पर भड़काई जाती है कि हिंदू धर्म ख़तरे में है और उसकी रक्षा की जानी चाहिए. विभिन्न धर्मों के कई अनुयायियों का आचरण धर्मसम्मत नहीं होता. आख़िर एडोल्फ हिटलर और नेल्सन मंडेला एक ही धर्म के थे. महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे का धर्म एक था. खान अब्दुल गफ्फार खान और ओसामा बिन लादेन एक ही धर्म के अनुयायी थे. यह सोचना पूरी तरह से ग़लत है कि हिंसा के पीछे धर्म होता है. दुर्भाग्यवश आज की दुनिया में अमेरिका की तेल संसाधनों पर क़ब्ज़ा करने की लिप्सा ने जिस राजनीति को जन्म दिया है, वह धर्म का लबादा ओढ़े हुए है. अमेरिका द्वारा स्थापित मदरसों में ही इस्लाम की दो महत्वपूर्ण अवधारणाओं, काफिर एवं जिहाद को विकृत अर्थ दिया गया, ताकि अ़फग़ानिस्तान से रूसी सेनाओं को खदेड़ने के लिए अलक़ायदा के लड़ाकों को तैयार किया जा सके. अमेरिकी मीडिया ने इस्लामिक आतंकवाद शब्द गढ़ा और उसे प्रचारित किया. इस शब्द का इतना उपयोग किया गया कि यह सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया और आमजन हिंसा को एक धर्म विशेष से जोड़ने लगे. ऐसे में यह स्वाभाविक था कि जब हिंदू राष्ट्र के पैरोकार कुछ हिंदू संगठनों की आतंकी घटनाओं में संलिप्तता सामने आई तो कुछ पत्रकारों ने हिंदू आतंकवाद शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. हिंदू आतंकवाद शब्द का उपयोग उतना ही ग़लत है, जितना इस्लामिक आतंकवाद या ईसाई आतंकवाद का. ईसाइयत भी शांति की बात करती है और इस्लाम भी अल्लाह के प्रति समर्पण के ज़रिए शांति की स्थापना का पक्षधर है. इस सिलसिले में गांधी जी के जीवन को हम धार्मिक शिक्षाओं के अनुरूप आचरण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कह सकते हैं. ओसामा एवं गोडसे के राजनीतिक लक्ष्य थे, जिन पर उन्होंने धर्म का मुलम्मा चढ़ाया. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, दयानंद पांडे एवं अन्य के गिरोह की कारगुज़ारियों के बावजूद हमें उनकी कुत्सित हरकतों को हिंदू आतंकवाद की संज्ञा देने से बचना चाहिए. धर्म को राजनीति ही नहीं, आतंकवाद से भी अलग रखा जाना आवश्यक एवं वांछनीय है.
(लेखक आईआईटी, मुंबई के पूर्व प्राध्यापक हैं)
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हिंदू धर्म के सिद्धांतों के इसी लचीलेपन एवं उदारता का फायदा उठाकर कुछ तत्व अपने बेहूदा विचारों को भी इसका हिस्सा घोषित कर देते हैं. धर्म एक जटिल संस्था है. इसमें धार्मिक संस्थान, पवित्र पुस्तकें, रीति-रिवाज, रूढ़ियां एवं परंपराएं शामिल हैं. इन सबका हमेशा एक-दूसरे से मेल खाना न तो संभव है और न आवश्यक.
इब्राहिम को अपना पूर्वज मानने वाले तीनों धर्मों की मान्यता है कि ईश्वर ने पैगंबरों के ज़रिए अपना संदेश भेजा. इसके विपरीत हिंदू धर्म का कोई पैगंबर नहीं है और वह शनै: शनै: विकसित हुआ है. समय के साथ नई परंपराएं एवं पंथ उसके हिस्से बनते गए. इन परंपराओं में वैदिक, उत्तर वैदिक, मध्यकालीन एवं आधुनिक परंपराएं शामिल हैं. कोई हिंदू नास्तिक भी हो सकता है, एकेश्वरवादी भी और कई भगवानों में आस्था रखने वाला भी. हिंदू धर्म के सिद्धांतों के इसी लचीलेपन एवं उदारता का फायदा उठाकर कुछ तत्व अपने बेहूदा विचारों को भी इसका हिस्सा घोषित कर देते हैं. धर्म एक जटिल संस्था है. इसमें धार्मिक संस्थान, पवित्र पुस्तकें, रीति-रिवाज, रूढ़ियां एवं परंपराएं शामिल हैं. इन सबका हमेशा एक-दूसरे से मेल खाना न तो संभव है और न आवश्यक. धार्मिक शिक्षाओं की व्याख्या तत्कालीन सामाजिक संदर्भों में की जानी चाहिए. हर धर्म शांति एवं सद्भाव को महत्व देता है, परंतु साथ ही हर धर्म में हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराने वाले तत्व भी हैं. बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि किसी धार्मिक सिद्धांत की व्याख्या कौन और किस उद्देश्य से कर रहा है. एक ही उदाहरण की कई व्याख्याएं की जा सकती हैं. इब्राहिम को अपना पूर्वज मानने वाले धर्मों में हिंसा की यत्र-तत्र चर्चा मात्र से उक्त धर्म हिंसा एवं आतंक के प्रणेता नहीं बन जाते. हिंसा और आतंक की जन्मदाता सामाजिक परिस्थितियां होती हैं, धार्मिक सिद्धांत नहीं. कई बार शासक एवं राजा अपने साम्राज्य का विस्तार करने की अपनी महत्वाकांक्षा को क्रूसेड, जिहाद या धर्मयुद्ध का नाम देकर उस पर धर्म का मुलम्मा चढ़ा देते हैं. हिंदू धर्म एक ओर तो वसुधैव कुटुंबकम की बात करता है तो दूसरी ओर जाति प्रथा के रूप में हिंसा उसके मूल ढांचे का हिस्सा है. वेदों से लेकर मनु स्मृति तक में वर्ण व्यवस्था एवं जाति प्रथा का उल्लेख है और कुछ साधु-संत आज भी जाति प्रथा को औचित्यपूर्ण ठहराते हैं. महाभारत में भगवान कृष्ण स्वयं अर्जुन से अपना धार्मिक कर्तव्य पूरा करने के लिए हथियार उठाने का आह्वान करते हैं. रामायण में हिंदू धर्म के रक्षार्थ भगवान राम शंबूक का वध करते हैं. हिंदू धर्म की रक्षा के लिए पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों का नरसंहार किया था. आज भी धार्मिक एवं जातिगत परंपराओं के नाम पर खाप पंचायतें युवा जोड़ों का क़त्ल कर रही हैं. मंगलोर के पब में लड़कियों की इसलिए पिटाई की गई, क्योंकि वे हिंदू परंपराओं के विरुद्ध आचरण कर रही थीं. अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा इस आधार पर भड़काई जाती है कि हिंदू धर्म ख़तरे में है और उसकी रक्षा की जानी चाहिए. विभिन्न धर्मों के कई अनुयायियों का आचरण धर्मसम्मत नहीं होता. आख़िर एडोल्फ हिटलर और नेल्सन मंडेला एक ही धर्म के थे. महात्मा गांधी और नाथूराम गोडसे का धर्म एक था. खान अब्दुल गफ्फार खान और ओसामा बिन लादेन एक ही धर्म के अनुयायी थे. यह सोचना पूरी तरह से ग़लत है कि हिंसा के पीछे धर्म होता है. दुर्भाग्यवश आज की दुनिया में अमेरिका की तेल संसाधनों पर क़ब्ज़ा करने की लिप्सा ने जिस राजनीति को जन्म दिया है, वह धर्म का लबादा ओढ़े हुए है. अमेरिका द्वारा स्थापित मदरसों में ही इस्लाम की दो महत्वपूर्ण अवधारणाओं, काफिर एवं जिहाद को विकृत अर्थ दिया गया, ताकि अ़फग़ानिस्तान से रूसी सेनाओं को खदेड़ने के लिए अलक़ायदा के लड़ाकों को तैयार किया जा सके. अमेरिकी मीडिया ने इस्लामिक आतंकवाद शब्द गढ़ा और उसे प्रचारित किया. इस शब्द का इतना उपयोग किया गया कि यह सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया और आमजन हिंसा को एक धर्म विशेष से जोड़ने लगे. ऐसे में यह स्वाभाविक था कि जब हिंदू राष्ट्र के पैरोकार कुछ हिंदू संगठनों की आतंकी घटनाओं में संलिप्तता सामने आई तो कुछ पत्रकारों ने हिंदू आतंकवाद शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया. हिंदू आतंकवाद शब्द का उपयोग उतना ही ग़लत है, जितना इस्लामिक आतंकवाद या ईसाई आतंकवाद का. ईसाइयत भी शांति की बात करती है और इस्लाम भी अल्लाह के प्रति समर्पण के ज़रिए शांति की स्थापना का पक्षधर है. इस सिलसिले में गांधी जी के जीवन को हम धार्मिक शिक्षाओं के अनुरूप आचरण का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कह सकते हैं. ओसामा एवं गोडसे के राजनीतिक लक्ष्य थे, जिन पर उन्होंने धर्म का मुलम्मा चढ़ाया. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, दयानंद पांडे एवं अन्य के गिरोह की कारगुज़ारियों के बावजूद हमें उनकी कुत्सित हरकतों को हिंदू आतंकवाद की संज्ञा देने से बचना चाहिए. धर्म को राजनीति ही नहीं, आतंकवाद से भी अलग रखा जाना आवश्यक एवं वांछनीय है.
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javed karimsab kureshi
2012-06-15 03:22:14asslaam alaykum salaam ti ho tum par khuda ki rahemat ho far maya muhammad(s.a.w.s.) ne ki jisne 3 tin juma fot kiya o mere mussle se nahi isliye namaz ki pa bandi kare
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